त्वचा रोग, आयुर्वेद उपचार, होम्योपैथिक औषधि, सुश्रुत संहिता, ग्रामीण स्वास्थ्य, सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम, स्वच्छता, फंगल संक्रमण, सोरायसिस, एक्ज़िमा--(Topical Diseases)
त्वचा रोग (Topical Diseases) — कारण, प्राचीन उपचार और आधुनिक चिकित्सा
त्वचा रोगों के कारण, लक्षण, आयुर्वेदाचार्यों के प्राचीन उपचार, होम्योपैथिक औषधियाँ, आधुनिक जांच पद्धति और सरकारी जागरूकता कार्यक्रमों की सरल व्याख्या।
त्वचा रोग क्या हैं?
त्वचा रोग या “टॉपिकल डिज़ीज़” वे बीमारियाँ हैं जो शरीर की बाहरी सतह — यानी त्वचा, सिर की खोपड़ी, नाखून, होंठ या बाहरी जननांगों को प्रभावित करती हैं।
ग्रामीण इलाकों में ये रोग बहुत सामान्य हैं, लेकिन अक्सर उपचार में देरी के कारण गंभीर संक्रमण का रूप ले लेते हैं।
गर्मी, धूल, गंदा पानी और नमी — इनसे ये रोग तेजी से फैलते हैं।
त्वचा रोगों के मुख्य प्रकार
1. बैक्टीरियल संक्रमण
- फोड़े, फुंसी, इंपेटाइगो, सेल्युलाइटिस।
- अचानक लालिमा, सूजन, दर्द और मवाद निकलना प्रमुख लक्षण हैं।
2. फंगल संक्रमण
- दाद
(Ringworm), पैर का फफूंद, नाखून में संक्रमण।
- त्वचा पर गोल दाने, खुजली और सफेद परत दिखाई देती है।
3. वायरल संक्रमण
- हरपीज, मस्से, शिंगल्स
(Zoster) जैसी बीमारियाँ फफोले बनाती हैं और जल्दी फैलती हैं।
4. परजीवी संक्रमण
- खुजली
(Scabies), जूँ का संक्रमण, जो रात में अधिक खुजली करवाता है।
5. एलर्जी या स्व-प्रतिरक्षी विकार
- एक्ज़िमा, सोरायसिस, पित्ती
(Urticaria) जैसे रोगों में शरीर अपनी ही त्वचा पर हमला करता है।
- ये संक्रामक नहीं होते पर जीवन को असहज बनाते हैं।
6. रंग या मेटाबॉलिज़्म से जुड़ी बीमारियाँ
- सफेद दाग
(Vitiligo), झाइयाँ (Melasma) त्वचा के रंग को बदल देती हैं।
आधुनिक (एलोपैथिक) निदान पद्धति
- त्वचा की स्क्रैपिंग या माइक्रोस्कोप जांच से फंगस या माइट्स का पता लगाया जाता है।
- रक्त जांच से संक्रमण या एलर्जी की पुष्टि की जाती है।
- त्वचा बायोप्सी पुरानी बीमारियों या कैंसर की शंका में की जाती है।
- डर्माटोस्कोप और वुड्स लैंप से रंग परिवर्तन या फंगल संक्रमण पहचाना जाता है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि बार-बार बिना सलाह के क्रीम या एंटीबायोटिक लगाने से संक्रमण-प्रतिरोध
(Resistance) बढ़ता है। इसलिए उपचार हमेशा चिकित्सक की देखरेख में करें।
होम्योपैथिक दृष्टिकोण और प्रमुख औषधियाँ
होम्योपैथी का उद्देश्य शरीर की आंतरिक रोग-प्रतिरोधक शक्ति को जागृत करना है।
कुछ प्रमुख औषधियाँ जो विशेषज्ञों द्वारा दी जाती हैं:
- Sulphur: पुरानी खुजली, जलन और गंदी-सी त्वचा के लिए।
- Graphites: कान, गर्दन या जोड़ों के पीछे बहने वाले एक्ज़िमा में।
- Rhus
tox: नमी या बारिश के बाद होने वाले लाल फफोले।
- Arsenicum
album: सूखी, पपड़ीदार त्वचा में जलन।
- Thuja: मस्से और वायरल दानों में।
- Natrum
mur: तैलीय त्वचा और मुँहासों में लाभदायक।
होम्योपैथी मानती है कि त्वचा रोग को दबाने से अंदरूनी अंग प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए धीरे-धीरे इलाज किया जाता है।
Psoriasis skin diseases
आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत व वाग्भट का मत
प्राचीन ग्रंथों में त्वचा रोगों को “कुष्ठ रोग” कहा गया है, जिनमें महा-कुष्ठ (गंभीर) और क्षुद्र-कुष्ठ (सामान्य) दो वर्ग बताए गए हैं।
सुश्रुत संहिता के अनुसार:
- त्वचा रोग वात-पित्त-कफ (त्रिदोष) और दूषित रक्त (दुष्ट रक्त) से उत्पन्न होते हैं।
- उपचार — वमन (उल्टी उपचार), विरेचन (पर्गेशन), रक्ता-मोक्षण (रक्तस्राव)।
- बाह्य लेप — नीम, हल्दी, करंज, मंजिष्ठा, त्रिफला आदि।
- आहार — तला-भुना, खट्टा व भारी भोजन त्यागें; कड़वे व हल्के भोजन लें।
वाग्भट के अनुसार:
- अभ्यंग (तेल मालिश), स्नान और पंचकर्म से शरीर को शुद्ध रखें।
- उन्होंने बताया कि तेज फैलने वाले चर्म रोग मेटाबॉलिज़्म को नष्ट कर जीवन के लिए खतरा बन सकते हैं — यही वैदिक दृष्टि से “घातक रोग” कहे गए हैं।
प्राचीन और आधुनिक चिकित्सा का समन्वय
- आयुर्वेद और होम्योपैथी शरीर की आंतरिक प्रतिरोधक शक्ति को मजबूत करते हैं।
- एलोपैथी से संक्रमण का सटीक निदान और आपातकालीन उपचार संभव है।
- व्यावहारिक ग्रामीण उपाय:
- त्वचा पर लालिमा या मवाद दिखे तो तुरंत पहचानें।
- प्रतिदिन स्नान करें, कपड़े धूप में सुखाएं।
- तौलिया, रेज़र, कपड़े साझा न करें।
- जड़ी-बूटी जैसे नीम, हल्दी, तुलसी का उपयोग सहायक रूप में करें, इलाज के विकल्प के रूप में नहीं।
सरकारी एजेंसियाँ और जन-जागरूकता
भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रमुख कार्यक्रम:
- राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम
(NLEP): त्वचा रोगों की पहचान और ग्रामीण शिक्षा पर कार्यरत।
- राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम
(NVBDCP): परजीवी और कीटजन्य रोगों पर निगरानी।
- केन्द्रीय आयुर्वेद अनुसंधान परिषद
(CCRAS): आयुर्वेदिक औषधियों पर अनुसंधान।
- केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद
(CCRH): होम्योपैथिक औषधियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन।
- राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र
(NCDC): स्वास्थ्य शिक्षा और महामारी नियंत्रण का मुख्य निकाय।
- आयुष्मान भारत व स्वच्छ भारत अभियान: गांव-गांव में स्वास्थ्य और स्वच्छता पर जन-जागरूकता।
ग्रामीण जनता के लिए उपयोगी सुझाव
- स्वच्छता अपनाएं — रोज स्नान करें, साफ कपड़े पहनें।
- स्टेरॉयड क्रीम बिना डॉक्टर की सलाह न लगाएं।
- नीम-हल्दी-एलोवेरा जैसे प्राकृतिक पदार्थों से त्वचा धोना लाभदायक है।
- बच्चों में खुजली या फोड़े दिखें तो तुरंत बताएं।
- आशा वर्कर या पीएचसी स्वास्थ्य शिविरों में नियमित जांच कराएं।
समापन — त्वचा रोगों से बचाव ही सर्वोत्तम दवा है
त्वचा रोग छोटे दिखते हैं, परंतु नजरअंदाज करने पर गंभीर रूप ले सकते हैं।
सुश्रुत, वाग्भट, होम्योपैथी और आधुनिक चिकित्सा — सभी का संदेश एक ही है:
स्वच्छ शरीर, मजबूत प्रतिरक्षा और समय पर जांच ही रोग-मुक्त जीवन का मार्ग है।
Results: Years lived with disability due to skin and subcutaneous diseases accounted for 4.02% of the total years lived with disability in India in 2017. There was an increase of 53.7% in all age standardised years lived with disability for all the skin and subcutaneous diseases from 1990 to 2017. Among skin and subcutaneous diseases, dermatitis contributed maximum years lived with disability (1.40 million; 95% uncertainty interval, 0.82–2.21) in 2017, followed by urticaria (1.02 million; 95% uncertainty interval, 0.06–1.44) with percentage increases of 48.9% and 45.7% respectively. Conclusion: The burden due to infectious skin diseases (e.g., scabies, fungal skin disease and bacterial skin disease) and non-infectious diseases (e.g., dermatitis, urticaria and psoriasis) has increased over the past three decades, however the age-standardised years lived with disability for leprosy, scabies, fungal infections, sexually transmitted infections and non-melanoma skin cancer (basal cell carcinoma) has decreased. The high burden of skin and subcutaneous diseases demand that they be given due importance in the national programmes and health policy of India. Keywords: Global Burden of Disease, skin and subcutaneous diseases, years lived with disability, prevalence and incidence of skin
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